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तन बचाने चले थे - रामावतार त्यागी

तन बचाने चले थे कि मन खो गया एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही और सब कुछ है वातावरण खो गया यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया गाँव का जो दिया था वचन खो गया जो हज़ारों चमन से महकदार था क्या किस
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