तमाम कैफ़ ख़मोशी तमाम नग़्म-ए-साज़ नवा-ए-राज़ है ऐ दोस्त या तेरी आवाज़ मेरी ग़ज़ल में मिलेगा तुझे वो आलमे-राज़ जहां हैं एक अज़ल से हक़ीक़त और मजाज़ वो ऐन महशरे-नज्‍़जारा हो कि ख़लवते-राज़ कहीं भी बन्द- नहीं है निगाहे-शाहिदबाज़ हवाएं नींद के खेतों से जैसे आती हों यहां से दूर नहीं है बहुत वो मक़तले-नाज़ ये जंग क्या है लहू थूकता है नज़्मे-कुहन शिगू़फ़े और खिलायेगा वक्‍़ते शोबदाबाज़ मशीअ़तों को बदलते हैं ज़ोरे-बाजू़ से 'हरीफ़े-मतलबे-मुश्किल नहीं फ़सूने-नेयाज़ इशारे हैं ये बशर की उलूहियत की तरफ़ लवें-सीं दे उठी अकसर मेरी जबीने-नेयाज़ भरम तो क़ुर्बते-जानाँ का रह गया क़ाइम ले आड़े आ ही गया चर्खे़-तफ़र्का़-परदाज़ निगाहे-चश्मे-सियह कर रहा है शरहे-गुनाह न छेड़ ऐसे में बहसे-जवाज़ो-गै़रे-जवाज़ ये मौजे-नकहते-जाँ-बख्‍़श यूँ ही उठती है बहारे-गेसु-ए-शबरंग तेरी उम्र दराज़ यॅ है मेरी नयी आवाज़ जिसको सुनके हरेक ये बोल उठे कि है ये तो सुनी हुई आवाज़ हरीफ़े-जश्ने-चिरागाँ है नग़्म-ए-ग़मे-दोस्त कि थरथराये हुए देख उठे वो शोला-ए-साज़ ‍फ़ि‍राक़ मंजि़ले-जानाँ वो दे रही है झलक बढ़ो कि आ ही गया वो मुक़ामे-दूरो-दराज़