सुरमई अंधकार था-- मछुआरी खपरैलों पर बिछा-बिछा टूटि नवों पर रोया-सोया भीतर-बाहर लिखा-दिखा समूचे सागर पर अछोर इसे बेचने आते हैं त्रिनेत्र ! लो ! देखते-देखते आरक्त हो उठी प्रति दिशा-दिशा रंग गई प्रति लहर-लहर खिल-खिला उठा राग- अब जीवन जल पुन: छलल छलल छलल...