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सूर्योदय - बलदेव वंशी

सुरमई अंधकार था-- मछुआरी खपरैलों पर बिछा-बिछा टूटि नवों पर रोया-सोया भीतर-बाहर लिखा-दिखा समूचे सागर पर अछोर इसे बेचने आते हैं त्र
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