सुर ही के भार, सूधे सबद सुकरीन के, मंदिर त्यागि करैं, अनत कं न गौन। द्विजदेव त्यौं ही मधु भारन अपारन सौं, नैकु झुकि झूमि रहे, मोगरे मरुअ दौन॥ खोलि इन नैननि, निहारौं तौ निहारौं कहा, सुखमा अभूत, छाइ रही प्रति भौन-भौन। चांदनी के भारन, दिखात उनयो सो चंद, गंध ही के भारन, बहत मंद-मंद पौन॥