जड़ों की डगमग खड़ाऊं पहने वह सामने खड़ा था सिवान का प्रहरी जैसे मुक्तिबोध का ब्रह्मराक्षस- एक सूखता हुआ लंबा झरनाठ वृक्ष जिसके शीर्ष पर हिल रहे तीन-चार पत्ते कितना भव्य था एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर महज तीन-चार पत्तों का हिलना उस विकट सुखाड़ में सृष्टि पर पहरा दे रहे थे तीन-चार पत्ते