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सृजन के क्षण - कुंवर नारायण

रात मीठी चांदनी है, मौन की चादर तनी है, एक चेहरा ? या कटोरा सोम मेरे हाथ में दो नयन ? या नखतवाले व्‍योम मेरे हाथ में? प्रकृति कोई कामिनी है? या चमकती नागिनी है? रूप- सागर कब किसी की चाह में मैले हुए? ये सुवासित केश मेरी बांह पर फैले हुए: ज्‍योति में छाया बनी है, देह से छाया घनी है, वासना के ज्‍वार उठ-उठ चंद्रमा तक खिंच रहे, ओंठ
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