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स्मृतियाँ - सुभद्राकुमारी चौहान

क्या कहते हो? किसी तरह भी भूलूँ और भुलाने दूँ? गत जीवन को तरल मेघ-सा स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ? शान्ति और सुख से ये जीवन के दिन शेष बिताने दूँ? कोई निश्चित मार्ग बनाकर चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ? कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन समझ नहीं पाती हूँ मैं वही समझने एक बार फिर क्षमा करो आती हूँ मैं। जहाँ तुम्हारे चरण, वहीँ पर पद-रज बनी पड़ी हूँ मैं मेरा निश्चित मार्ग यही है ध्रुव-सी अटल अड़ी हूँ मैं। भूलो तो सर्वस्व ! भला वे दर्शन की प्यासी घड़ियाँ भूलो मधुर मिलन को, भूलो बातों की उलझी लड़ियाँ। भूलो प्रीति प्रतिज्ञाओं को आशाओं विश्वासों
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