प्रेयसि, इन प्यासी पलकों में मंदाकिनी प्रवाहित कर दो। इन निःस्वन जीवन-छिद्रों को अपने सुधा-श्वास से भर दो। मेरी चंचल रूप-तृषा को ढँक को स्नेहांचल-छाया में; अमर-लोक की करो प्रतिष्ठा मेरी इस नश्वर काया में। यह अनिंद्य सौंदर्य! आह, क्या इस पर मर्त्यों का अधिकार? यह चिर-यौवन! इसे चाहिए अजर प्यार, अमरों का प्यार! आओ, जग के कुश-काँटों को पारिजात के पुष्प बनावें; जन्म-मरन की धूप छाँह में चिरशिशु-से खेलें, सुख पावें। तुम अंतर की रूप-सुधा से मधुर करो त्रिभुवन का जीवन; मैं प्राणों की प्रेम-ज्योति से जगमग कर दूँ जग का आँगन। ‘अशिव, असुंदर’ की समाधि पर ‘चिरसुंदर, शिव’ का उत्थान! एक साधना मानवता की!--शत-शत स्वर्गों का निर्माण!!