शौक हर रंग, रकीबे-सरो-सामां निकला कैस तसवीर के परदे में भी उरीयां निकला ज़ख़्म ने दाद न दी तंगीए-दिल की या रब तीर भी सीना-ए-बिसमिल से पर-अफ़शां निकला बूए-गुल, नाला-ए-दिल, दूदे-चराग़े-महफ़िल जो तिरी बज़म से निकला, सो परीशां निकला दिले-हसरतज़दा था मायद-ए-लज़्ज़ते-दर्द काम यारों का, बकदरे-लबो-दन्दां निकला है नौआमोज़े-फ़ना, हिंमते-दुशवार-पसन्द सख़त मुशकिल है, कि यह काम भी आसां निकला दिल में फिर गिरीए ने जोर (शोर) उठाया, 'ग़ालिब' आह जो कतरा न निकला था, सो तूफ़ां निकला