जो कहना चाहती हूँ मैं
नहीं कोई काल्पनिक कथा है
वास्तव में जो मैंने देखी सुनी
एक छोटी बच्ची की व्यथा है
उस पर मेरी निगाह पड़ी थी
देखा तो वो शून्य को ताक रही थी
बाल बिखरे, त्वचा रूखी फटी सी थी
चेहरे से उसके बरबस
मासूमियत झलक रही थी
उम्र उड़की चार पाँच से
अधिक न थी
लेकिन वक़्त की मार से
वो घायल बहुत ज़्यादा थी
देख उसको तीव्र जिज्ञासा मुझमें जागी
पूछनी चाही मैंने पूरी दास्ताँ उसकी
उसने जो कुछ बताया मुझे
उसके लिए रोज़ की कहानी थी
पर सुनकर उसे आत्मा
मेरी बहुत घबराई थी
माँ उसकी घरों में काम कर
सबका पेट भरती थी
वो अपनी माँ का हाथ बटाने आयी थी
मैंने उग्र होकर माँ से पूछा
इस बचपन को तबाह करने का तुम्हें क्या हक़ है?
कहने लगी छोड़ नहीं सकती घर में
क्या करूं पति की नीयत पर शक है
और कुछ न बाकी था सुनने के लिए
समझ आ गया था घर नहीं वो नर्क है
उस बिटिया के भाई ने
दस दिन पहले ही जन्म लिया था
उसे इस गृह स्थिति में जन्मा देखकर
बहन ने भाई की मौत के लिए हाथ जोड़ा था
सुनकर ये सब मुझे लगा
उस मासूम को मैं कुछ सपने दिखाऊं
इन हालातों से बहुत दूर उसे मैं ले जाऊं
फिर कुछ सोचकर
मैंने उससे पूछा
सपने क्या है तुम्हारे?
बनना क्या चाहती हो ?
उसका जवाब कुछ न था
ज़हन उसका इन शब्दों से
इन प्रश्नों से अंजान था
चेहरे पर उसके छायी गहरी उदासी थी
मैं भी अपने प्रश्न पर बेहद शर्मिंदा थी
लगा मुझे यूं मानो वो कह रही थी
"मैं बचपन तो वो कब का भूल चुकी हूँ
अपने पराये सबको परख चुकी हूँ
उम्र से बहुत ज़्यादा जी चुकी हूँ
और रही बात सपनों की
वो तो सारे मैं नाली में फेंक चुकी हूँ..."