
समुंदर की ख़ुश्बू
कहीं दूर से आ रही है,
समुंदर की बू से हैं बोझल... नशीली हवाएँ
हवाएँ
जो साहिल की ख़स्ता तमन्ना से टकरा रही हैं
हवाएँ पुराने ज़माने के कुछ राज़ दोहरा रही हैं
यहाँ से ज़रा फ़ासले पर नगर है
जहाँ लोग बस्ते हैं
अपनी ख़मोशी में डूबी हुई ज़िंदगी को... सहारा दिए
लोग रोते हैं... हँसते हैं
अपने पुराने घरों में
हवाएँ
पुराने घरों की मुंडेरों से टकरा रही हैं
पुराने घरों की छतों में... हदों में
पुराने परिंदों की हैं आशियाने
पुराने घरों के मकीनों के
अपने फ़सुर्दा फ़साने,
कोई अपने दिल का फ़साना
परिंदों से कहता नहीं है
नशीली <
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