साँझ के साँचे बोल तिहारे। रजनी अनत जागे नंदनंदन आये निपट सवारे॥१॥ अति आतुर जु नीलपट ओढे पीरे बसन बिसारे। कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर भले वचन प्रतिपारे॥२॥