शहर में घूरती निगाहों से डर लगता है बातों से नहीं अफ़वाहों से डर लगता है करें तय कौन सा रास्ता समझ नहीं आता हमें भीड़ से भरी हुई राहों से डर लगता है सच मर जाता है झूठ ज़िन्दा बैठा यहाँ दूसरों के नहीं अपने गुनाहों से डर लगता है कौन दे रहा दिलासा कि भड़का रहा आग अब अपनों की भी सलाहों से डर लगता है छुपा बैठा हैं कौन सा साँप किस आस्तीन में गले मिलने को आई बाँहों से डर लगता है वादों से ज़िन्दगी नहीं चलता न पेट भरता ज़रूरत से ज़्यादा परवाहों से डर लगता है साँस लेना भी हो गया है मुश्किल अब यहाँ सायँ सायँ करती हवाओं से डर लगता है शहर में घूरती निगाहों से डर लगता है बातों से नहीं अफ़वाहों से डर लगता है करें तय कौन सा रास्ता समझ नहीं आता हमें भीड़ से भरी हुई राहों से डर लगता है