रेत का समंदर में वो कुछ ढूंढते रहे
हवा के थपेड़ो में कोई लफ्ज़ था जो न मिला,
बाजार में निकल कर भी, निगाहें तलाशती रही,
हम भी समझ न पाए, वो कौन था जो न मिला
जो सीधा रास्ता था अब टेढ़ा- मेढ़ा हो चला
जिससे कुछ वास्ता था वो अपने रास्ते चला
फिर भी ज़ारी है तलाश, निगाह से, आह से
समझ आता है रिश्ता उनके दिल के पनाह से
बदल सा गया है वो, मुझे भी नही पहचानता
शायद मेरा चहरा कुछ पुराना सा हो चला
लेकिन जिस राह पर वो चल रहे है,
आज तक वो शख्स न मिला,,
कसूर मेरा क्या क्यों मुझसे ये शिकवा
कुछ गिला हवा से रख, वो लफ्ज़ तुझे न मिला
बारिशो के मौसम में भीगना, शौक नया तो नहीं,
दोस्ती गहरी थी छत से, लेकिन तुझे क्या मिला ..
अक्स तेरा में खुदमे ढूंढता हूँ, ज़माना पूछता है के क्यों ढूंढता हूँ
गुरूर तेरा आसमान से नहीं कम, फिर भी सादगी कि झलक ढूंढता हूँ...
रेत का समंदर अब बड़ा हो चला,
खो से गए लफ्ज़ जिन्हें वो ढूंढने चला.