
रह-रवी है न रह-नुमाई है
आज दौर-ए-शकिस्ता-पाई है
अक़्ल ले आई ज़िंदगी को कहाँ
इश्क़-ए-नादाँ तेरी दुहाई है
है उफ़ुक़ दर उफ़ुक़ रह-ए-हस्ती
हर रसाई में नारसाई है
शिकवे करता है क्या दिल-ए-नाकाम
आशिक़ी किस को रास आई है
हो गई गुम कहाँ सहर अपनी
रात जा कर भी रात आई है
जिस में एहसास हो असीरी का
वो रिहाई कोई रिहाई है
कारवा
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