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राधाकृष्ण - कमलानंद सिंह 'साहित्य सरोज'

कौतुक हरि राधा को हरि। ललचावत सुरवृन्द चहत वृज जन्म लेहि एक वेरि॥ बनि बनि सखा चरावे गैया लावे वन के फूल। वनमाला रचि के पहिरावे दोउ को सुख भूल॥ गावे नाचे और ब
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