
क़त्ले-आशिक़ किसी माशूक़ से कुछ दूर न था
पर तेरे अहद के आगे तो ये दस्तूर न था
रात मजलिस में तेरे हुस्न के शोले के हज़ूर
शम्मअ के मुँह पे जो देखा तो कहीं नूर न था
ज़िक्र मेरा ही वो करता था सरीहन लेकिन
मैं जो पहुँचा तो कहा ख़ैर ये मज़कू
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