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प्यास के क्षण - बालस्वरूप राही

बाँट दो सारा समंदर तृप्ति के अभिलाषकों में, मैं अंगारे से दहकते प्यास के क्षण माँगता हूँ, दूर तक फैली हुई अम्लान कमलों की कतारें, किन्तु छोटा है बहुत मधुपात्र रस लोभी भ्रमर का, रिक्त हो पाते भला कब कामनाओं की सुराही, टूट जाता है चिटख कर किन्तु हर प्याला उमर का, बाँट दो मधुपर्क सारा इन सफल आराधकों में, देवता मैं तो कठिन उपवास के क्षण माँगता हूँ, वह नहीं धनवान जिसके पास भारी संपदा है, वह धनी है, जो कि धन के सामने झुकता नहीं है, प्यास चाहे ओंठ पर सारे मरुस्थल ला बिछाये, देखकर गागर पराई, किन्तु जो रुकता नहीं है, बाँट दो सम्पूर्ण वैभव तुम कला के साधकों में, किन्त
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