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पुष्प विकास - रामनरेश त्रिपाठी

एक दिन मोहन प्रभात ही पधारे, उन्हें देख फूल उठे हाथ-पांव उपवन के । खोल-खोल द्वार फूल घर से निकल आए, देख के लुटाए निज कोष सुबरन के ।।
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