प्रिय! मैं हूँ एक पहेली भी !
जितना मधु जितना मधुर हास
जितना मद तेरी चितवन में
जितना क्रन्दन जितना विषाद
जितना विष जग के स्पन्दन में
पी पी मैं चिर दुख-प्यास बनी
सुख-सरिता की रंगरेली भी !
मेरे प्रतिरोमों से अविरत,
झरते हैं निर्झर और आग;
करती विरक्ति आसक्ति प्यार,
मेरे श्वासों में जाग जाग;
प्रिय मैं सीमा की गोदपली
पर हूँ असीम से खेली भी !