मैं बन्दी बन्दी मधुप, और यह गुंजित मम स्नेहानुराग, संगम की गोदी में पोषित शोभित तू शतदल प्रयाग ! विधि की बाहें गंगा-यमुना तेरे सुवक्ष पर कंठहार,-- लहराती आतीं गिरि-पथ से, लहरों में भर शोभा अपार ! देखा करता हूँ गंगा में उगता गुलाब-सा अरुण प्रात, यमुना की नीली लहरों में नहला तन ऊठती नित्य रात ! गंगा-यमुना की लहरों में कण-कण में मणि नयनाभिराम बिखरा देती है साँझ हुए नारंगी रँग की शान्त शाम ! तेरे प्रसाद के लिए, तीर्थ ! आते थे दानी हर्ष जहाँ पल्लव के रुचिर किरीट पहन आता अब भी ऋतुराज वहाँ ! कर दैन्य-दुःख-हेमन्त-अन्त वैभव से भर सब शुष्क वृन्त हर साल हर्ष के ही समान सुख-हर्ष-पुष्प लाता वसन्त ! स्वर्णिम मयूर-से नृत्य करते उपवन में गोल्ड मोहर, कुहुका करती पिक छिप छिप कर तरुओं में रत प्रत्येक प्रहर ! भर जाती मीठी सौरभ-से कड़वे नीमों की डाल डाल, लद जाते चलदल पर असंख्य नवदल प्रवाल के जाल लाल ! 'मधु आया', कहते हँस प्रसून, पल्लव 'हाँ' कह कह हिल जाते आलिंगन भर, मधु-गंध-भरी बहती समीर जब दिन आते ! शुचि स्वच्छ और चौड़ी सड़कों के हरे-भरे तेरे घर में, सबको सुख से भर देता है ऋतुपति पल भर के अन्तर में ! मधु के दिन पर कितने दिन के ! -- आतप में तप जल जाता सब तू सिखलाता, कैसे केवल पल भर का है जग का वैभव ! इस स्वर्ण-परीक्षा से दीक्षा ले ज्ञानी बन मन-नीरजात, शीतल हो जाता, आती है जब सावन की मुख-सरस रात ! जब रहा-सहा दुख धुल जाता, मन शुभ्र शरद्-सा खिल जाता यों दीपमिलिका में आलोकित कर पथ विमल शरद् आता ! ऋतुओं का पहिया इसी तरह घूमा करता प्रतिवर्ष यहाँ, तेरे प्रसाद के लिए तीर्थ ! आते थे दानी हर्ष जहाँ ! खुसरू का बाग सिखाता है, है धूप-छाँह-सी यह माया, वृक्षों के नीचे लिख जाती है यों ही नित चंचल छाया ! वह दुर्ग !--जहाँ उस शान्ति-स्तम्भ में मूर्तिमान अब तक अशोक, था गर्व कभी, पर आज जगाता है उर उर में क्षोभ-शोक ! तू सीख त्याग, तू सीख प्रेम, तू नियम-नेम ले अज्ञानी-- क्या पत्थर पर अब तक अंकित यह दया-द्रवित कोमल वाणी?-- जिसमें बोले होंगे गद्गद वे शान्ति-स्नेह के अभिलाषी-- दृग भर भर शोकाकुल अशोक; सम्राट्, भिक्षु औ' संन्यासी ! उस पत्थर अंकित है क्या ? क्या त्याग, शान्ति, तप की वाणी ? जिससे सीखें जीवन-संयम, सर्वत्र-शान्ति सब अज्ञानी ! संदेश शान्ति का ही होगा, पर अब जो कुछ वह लाचारी-- बन्दी बल-हीन गुलामों की जड़मूक बेबसी बेचारी ! दुख भी हलका हो जाता है अब देख देख परिवर्तन-क्रम, फिर कभी सोचने लगता हूँ यह जीवन सुख-दुख का संगम ! बेबसी सदा की नहीं, सदा की नहीं गुलामी भी मेरी, हे काल क्रूर, सुन ! कभी नहीं क्या करवट बदलेगी तेरी ? यह जीवन चंचल छाया है, बदला करता प्रतिपल करवट, मेरे प्रयाग की छाया में पर, अब तक जीवित अक्षयवट ! -- क्या इसके अजर-पत्र पर चढ़ जीवन जीतेगा महाप्रलय ? कह, जीवन में क्षमता है यदि तो तम से हो प्रकाश निर्भय ! मैं भी फिर नित निर्भय खोजूँ शाश्वत प्रकाश अक्षय जीवन, निर्भय गाऊँ, मैं शान्त करूँ इस मृत्युभित जग का क्रन्दन ! है नये जन्म का नाम मृत्यु, है नई शक्ति का नाम ह्रास, -- है आदि अन्त का, अन्त आदि का यों सब दिन क्रम-बद्ध ग्रास ! प्यारे प्रयाग ! तेरे उर में ही था यह अन्तर-स्वर निकला, था कंठ खुला, काँटा निकला, स्वर शुद्ध हुआ, कवि-हृदय मिला ! कवि-हृदय मिला, मन-मुकुल खिला, अर्पित है जो श्री चरणों में, पर हो न सकेगा अभिनन्दन मेरे इन कृत्रिम वर्णों में ! ये कृत्रिम, तू सत्-प्रकृति-रूप, हे पूर्ण-पुरातन तीर्थराज ! क्षमता दे, जिससे कर पाऊँ तेरा अनन्त गुण-गान आज ! दे शुभाशीस, हे पुण्यधाम !, वाणी कल्याणी हो प्रकाम-- स्वीकृत हो अब श्री चरणों में बन्दी का यह अन्तिम प्रणाम ! तेरे चरणों में शीश धरे आये होंगे कितने नरेन्द्र, कितने ही आये, चले गये, कुछ दिन रह अभिमानी महेन्द्र ! मैं भी नरेन्द्र, पर इन्द्र नहीं, तेरा बन्दी हूँ, तीर्थराज ! क्षमता दे जिससे कर पाऊँ तेरा अनन्त गुण-गान आज !!