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प्रथम रश्मि - सुमित्रानंदन पंत

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! तूने कैसे पहचाना? कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि! पाया तूने वह गाना? सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में, पंखों के सुख में छिपकर, ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर, प्रहरी-से जुगनू नाना। शशि-किरणों से उतर-उतरकर, भू पर कामरूप नभ-चर,
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