प्रकृति रमणीक है। जिसने इतना ही कहा- उसने संकुल सौंदर्य के घनीभूत भार को आत्मा के कंधों पर पूरा नहीं सहा! भीतर तक क्षण भर भी छुआ यदि होता- सौंदर्य की शिखाओं ने, जल जाता शब्द-शब्द, रहता बस अर्थकुल मौन शेष। ऐसा मौन-जिसकी शिराओं में, सारा आवेग-सिंधु, पारे-सा- इधर-उधर फिरता बहा-बहा! प्रकृति ममतालु है! दूधभरी वत्सलता से भीगी- छाया का आँचल पसारती, -ममता है! स्निग्ध रश्मि-राखी के बंधन से बांधती, -निर्मल सहोदरा है! बाँहों की वल्लरि से तन-तरू को रोम-रोम कसती-सी! औरों की आँखों से बचा-बचा- दे जाती स्पर्शों के अनगूंथे फूलों की पंक्तियाँ- -प्रकृति प्रणयिनी है! बूंद-बूंद रिसते इस जीवन को, बांध मृत्यु -अंजलि में भय के वनांतर में उदासीन- शांत देव-प्रतिमा है! मेरे सम्मोहित विमुग्ध जलज-अंतस्‌ पर खिंची हुई प्रकृति एक विद्युत की लीक है! ठहरों कुछ, पहले अपने को, उससे सुलझा लूँ तब कहूँ- प्रकृति रमणीक है...