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प्रभाती - रघुवीर सहाय

आया प्रभात चन्दा जग से कर चुका बात गिन-गिन जिनको थी कटी किसी की दीर्घ रात अनगिन किरणों की भीड़भाड़ से भूल गए पथ, और खो गए, वे तारे। अब स्वप्नलोक के वे अविकल शीतल, अशोक पल जो अब तक थे फैल-फैल कर रहे रोक
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