फिरे, सब फिरे लहरों के बीच हम अकेले ही तिरे कोई द्वार से ही, कोई गाँव के सिवान से कोई पनघट से, कोई खेत-खलिहान से जानकर फिरे कोई फिरे अनजान-से आप अपने ही से घिरे लौट गए कोई सुभाषित उछालते सावधान करते, सहेजते, सँभालते कुछ फिरे तीर से नयन-नीर ढालते रूप के रसिक जो निरे नीचे महासिंधु, नभ ऊपर अपार है कोई संग-साथ न तो प्रिय-परिवार है झंझा की नाव, ज्वार की ही पतवार है कभी उठ गए, कभी गिरे फिरे, सब फिरे लहरों के बीच हम अकेले ही तिरे