उस बुझी सी राख पर,
सुप्त होती नदी किनारे
कुछ गर्म हवाओं के थपेड़े
अधजली कुछ लकड़िया
स्वेत वस्त्र की काली छाह
और थक चुकी आहों के बीच
मै देखता तुझे जाता हुआ
और फिर सोचता हुआ
की जब मिले थे हम कभी
तुम उन्मुक्त अहसास,
और जैसे कोई स्वक्छंद
स्पृश, कोमल जैसे पंखुरी
मै ठिठका , निशब्द सा
कुछ कुन्द, पत्थर सा सही
और तेरी हंसी में खोया
मै बहता तिनका सा सही
कुछ अश्रु जब बेबाक हुए
फिर अभी आभास हुआ
कुछ भी बदला तो नहीं
मै भी वही, तुम भी वही
मै फिर खोया सा
ठिठका
निशब्द
बिखरा हुआ किसी तिनके सा
और तुम फिर से वही
उन्मुक्त
स्वक्छंद
एक स्पृश