तुम्हें याद है क्या उस दिन की नए कोट के बटन होल में, हँसकर प्रिये, लगा दी थी जब वह गुलाब की लाल कली ? फिर कुछ शरमा कर, साहस कर, बोली थीं तुम- "इसको यों ही खेल समझ कर फेंक न देना, है यह प्रेम-भेंट पहली!" कुसुम कली वह कब की सूखी, फटा ट्वीड का नया कोट भी, किन्तु बसी है सुरभि ह्रदय में, जो उस कलिका से निकली !