हो चुकी क़ौम के मातम में बहुत सीनाज़नी अब हो इस रंग का सन्यास[3]ये है दिल में ठनी मादरे-हिन्द की तस्वीर हो सीने पे बनी बेड़ियाँ पैर में हों और गले में क़फ़नी हो ये सूरत से अयाँ आशिक़े-आज़ादी है कुफ़्ल है जिनकी ज़बाँ पर यह वह फ़रियादी है आज से शौक़े वफ़ा का यही जौहर होगा फ़र्श काँटों का हमें फूलों का बिस्तर होगा फूल हो जाएगा छाती पे जो पत्थर होगा क़ैद ख़ाना जिसे कहते हैं वही घर होगा सन्तरी देख के इस जोश को शरमाएँगे गीत ज़ंजीर की झनकार पे हम गाएँगे