खाओ-खाओ, उनकी खाओ, उनकी गाओ, हमको बाँटो। इनसानों का साथ छोड़कर धनवानों के पत्तल चाटो। अव्वल-अव्वल जो दिखते हैं, ठग है, सब-के-सब बिकते हैं, झूठे, क़ातिल और लुटेरे, चोर, चार सौ बीस सँपेरे, राजनीति की चादर ओढ़े लोकतन्त्र के फुंसी-फोड़े जाओ तुम भी गाल बजाओ, हुक्का-पानी करो, कराओ घड़ियालों के आँसू पोछो, आदमखोरी में दिन काटो। हम हैं अपने मित्र-गाँव के, वे मतलब के और दाँव के, हम सब हैं जन-मन के प्यारे, वे सब खड़े बज़ार-बज़ारे हमको भगत-सुभाष चाहिए, उन्हें देश का नाश चाहिए जाओ तुम गलबहियाँ डालो, आस्तीन में अजगर पालो बस्ती-बस्ती मानवता की क़ब्र खोदकर मिट्टी पाटो। सिसक रहे खेतिहर-मजूरे, तुम सर्कस में बने जमूरे आधी आबादी पर आफ़त, तुम उनके संग करो शराफ़त कोठी बेचो, कोठे बेचो, घर-घर खूब मुखौटे बेचो जात-पाँत के पँगे बेचो, नफ़रत बेचो, दंगे बेचो आँख-आँख में धूल झोक कर बचा-खुचा उजियारा छाँटो।