एक डॉक्टर मित्र हमारे स्वर्ग सिधारे। असमय मर गए, सांत्वना देने हम उनके घर गए। उनकी नन्ही-सी बिटिया भोली-नादान थी, जीवन-मृत्यु से अनजान थी। हमेशा की तरह द्वार पर आई, देखकर मुस्कुराई। उसकी नन्ही-सचाई दिल को लगी बेधने, बोली— अंकल ! भगवान जी बीमार हैं न पापा गए हैं देखने।