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नदी - रवीन्द्र प्रभात

उम्र के- एक पड़ाव के बाद अल्हड़ हो जाती नदी ऊँचाई-निचाई की परवाह के बग़ैर लाँघ जाती परम्परागत भूगोल हहराती- घहराती धड़का जाती गाँव का दिल बेँध जाती शिलाखंडों के पोर -पोर अपने सुरमई सौंदर्य, भँवर का वेग और, विस्तार की स्वतंत्रता के कारण...! आक्रोशित हो जाती नदी एक पड़ाव के बाद जब बर्दाश्त नहीं कर पाती पुर्वा-पछुवा का दिलफेंक अंदाज़ बहक कर बादलों का उमड़ना - घुमड़ना और, ठेकेदारों का बढ़ता हुआ हाथ अपनी ओर तब, निगल जाती अचानक सारा का सारा गाँव व्याघ्रमती की तरह
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