न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता हुआ जब ग़म से यूं बेहस, तो ग़म क्या सर के कटने का न होता गर जुदा तन से, तो जानूं पर धरा होता हुयी मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया, पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता Hindi Poetry, Mirza Ghalib