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मुक्तक - श्रीकृष्ण सरल

सैकड़ों, हजारों, लाखों आते–जाते हैं उनके आने–जाने से पड़ता फर्क नहीं, वे बना सकें इस दुनिया को यदि स्वर्ग नहीं इतना तो हो, वे इसे बनाएँ नर्क नहीं। यदि किसी एक के भी हम आँसू पोंछ सके यदि किसी एक भूखे को रोटी जुटा सके, सौभाग्य हमारा, यदि ऐसा कुछ कर पाए अपनेपन का धन यदि हम सब में लुटा सकें। ह
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