मेरी अक्ल-ओ-होश की सब आसाईशें तुमने सांचे में ज़ुनूं के ढाल दी कर लिया था मैंने अहद-ए-तर्क-ए-इश्क तुमने फिर बाँहें गले में डाल दी यूँ तो अपने कासिदाने-दिल के पास जाने किस-किस के लिए पैगाम है जो लिखे जाते थे औरो के नाम मेरे वो खत भी तुम्हारे नाम हैं ये तेरे खत, तेरी खुशबू, ये तेरे ख्वाब-ओ-खयाल, मताऐ-जाँ है तेरे कौल-ओ-कसम की तरह गुजश्ता सालों मैनें इन्हे गिन के रखा है किसी गरीब की जोड़ी हुई रकम की तरह है मुहब्ब्त हयात की लज्जत वरना कुछ लज़्ज़त-ए-हयात नहीं क्या इज़ाज़त है एक बात कहूँ मगर खैर कोई बात नहीं