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मेरे देश के लाल - बालकवि बैरागी

पराधीनता को जहाँ समझा श्राप महान कण-कण के खातिर जहाँ हुए कोटि बलिदान मरना पर झुकना नहीं, मिला जिसे वरदान सुनो-सुनो उस देश की शूर-वीर संतान आन-मान अभिमान की धरती पैदा करती दीवाने मेरे देश के लाल हठीले शीश झुकाना क्या जाने। दूध-दही की नदियां जिसके आँचल में कलकल करतीं हीरा, पन्ना, माणिक से है पटी जहां की शुभ धरती हल की नोंकें जिस धरती की मोती से मांगें भरतीं उच्च हिमालय के शिखरों पर जिसकी ऊँची ध्वजा फहरती रखवाले ऐसी धरती के हाथ बढ़ाना क्या जाने मेरे देश के लाल हठीले शीश झुकाना क्या जाने। आज़ादी अधिका
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