मेरा तो लघु तारा कुल आकाश तुम्हारा मेरी वीणा, गूँज नहीं पायी जिसकी ध्वनि क्षीणा दीना, हीना और तुम्हारी स्वर-माधुरी नवीना, नया सलिल, नव धारा, प्रेम किसी का अथवा कोई सपना फीका-फीका मेरे जी का, शीश तुम्हारे विश्व-विजय का टीका सुन्दर, सहज, सँवारा, संध्या-वेला, लहरों-सा सुख-दुख मैंने सब झेला सबसे खेला देख चुका अपनों की भी अवहेला, छलता रहा किनारा मेरा तो लघु तारा कुल आकाश तुम्हारा