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मेरा मन - नरेन्द्र शर्मा

मेरा चंचल मन भी कैसा, पल में खिलता, मुरझा जाता! जब सुखी हुआ सुख से विह्वल, जब दु:खी हुआ दु:ख से बेकल, वह हरसिंगार के फूलों सा सुकुमार सहज कुम्हला जाता! फूला न समाता खुश होकर, या घर भर देता रो-रोकर, या तो कहता, 'दुनिया मेर
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