मेरा इक गाँव भी है शहर में
नानी साथ रहती है मेरे घर में।
न चारागर न हकीम हैं यहाँ
थोड़ी दुआ तो मिला दो ज़हर में।
मुफलिसी ,जिल्लत,जफा तो हैं
क्या कुछ छूटा मुझसे सफर में।
बद्दुआ दी कम शिद्दत से शायद
थोड़ी कमी दिखी तो है असर में।
साहिल से हुई समंदर की यारी
अब वो बात कहाँ है लहर में।