जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार । कला कौशल खेती व्यापार, हवाई यान, रेल या तार । सभी के एकमात्र आधार, हमारे बिना नहीं उद्धार ।। जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। रत्नगर्भा से लेकर रत्न, विश्व को हमने बीहड़ वन सयत्न । काटकर बीहड़ वन अभिराम, लगाए रम्य रम्य आराम । झोंपड़ी हो या कोई महल, हमारे बिना न बनना सहल ।। जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। किसा का लिया नहीं आभार, बाहुबल रहा सदा आधार । पूर्ण हम संसृति के अवतार, हमारे हाथों बेड़ा पार ।। उठाया है हमने भू-भार, हुआ हमसे सुखमय संसार । जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। हाय ! उसका यह प्रत्युपकार, तुच्छ हमको समझे संसार । बन गए कितने ठेकेदार, भोगने को सम्पत्ति अपार ।। हमारा दारून हा-हाकार, उन्हें हैं वीणा की झनकार । जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। भाग्य का हमें भरोसा दिया, विभव सब अपने वश में किया । जहाँ तक बना रक्त पर लिया, वज्र की छाती, पत्थर हिया । किसी ने ज़ख़्मेदिल कब सिया, जिया दिल अपना पर क्या जिया । जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। दिया था जिनको अपना रक्त, प्राण के प्यासे वे बन गए । नम्रता पर थे हम आसक्त, और भी हमसे वे तन गए ।। हाय रे स्वार्थ न तेरा अन्त, जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। बहुत सह डाले हैं सन्ताप, गर्दनें काटीं अपने-आप । न जाने था किसका अभिशाप, न जाने किन कृत्यों का पाप ।। हो रही थीं आँखें जो बन्द, पद-दलित होने को सानन्द । जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।। रचेंगे हम अब नव संसार, न होने देंगे अत्याचार । प्रकृति ही का लेकर आधार, चलाएँगे सारे व्यवहार ।। सिद्ध कर देंगे बारम्बार, और देखेगा विश्व अपार । जगत के केवल हम कर्त्तार, हमीं पर अवलम्बित संसार ।।