मौजों का अक्स है, ख़त-ए-जाम-ए-शराब में या ख़ून उछल रहा है, रग-ए-माहताब में वो मौत है कि कहते हैं, जिसको सुकून सब वो ऐन ज़िन्दगी है,जो है इज़्तराब में दोज़ख़ भी एक जल्वा-ए-फ़िरदौस-ए-हुस्न है जो इस से बेख़बर हैं, वही हैं अज़ाब में उस दिन भी मेरी रूह थी, मह्व-ए-निशात-ए-दीद मूसा उलझ गए थे, सवाल-ओ-जवाब में मैं इज़्तराब-ए-शौक़ कहूँ या जमाल-ए-दोस्त इक बर्क़ है जो कौंध रही है नक़ाब में