मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ नील गगन में पंख पसारूँ; दुःख है, तुमसे बिछड़ गया हूँ किन्तु तुम्हारी सुधि न बिसारूँ! उलझन में दुःख में वियोग में अब तुम याद बहुत आती हो; घनी घटा में तुमको खोजूँ मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ; जब से बिछुड़े हैं हम दोनों मति-गति मेरी बदल गई है; पावस में हिम में बसंत में हँसते-रोते तुम्हें पुकारूँ! तब तक मन मंदिर में मेरे होती रहे तुम्हारी पग-ध्वनि; तब तक उत्साहित हूँ, बाजी इस जीवन की कभी न हारूँ! तुम हो दूर दूर हूँ मैं भी जीने की यह रीती निकालें, तुम प्रेमी हो-प्रेम पसारो मैं प्रेमी हूँ-जीवन वारूँ!!