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मैं अकेला और पानी बरसता है - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं अकेला और पानी बरसता है प्रीती पनिहारिन गई लूटी कहीं है, गगन की गगरी भरी फूटी कहीं है, एक हफ्ते से झड़ी टूटी नहीं है, संगिनी फिर यक्ष की छूटी कहीं है, फिर किसी अलकापुरी के शून्य नभ में कामनाओं का अँधेरा सिहरता है। मोर काम-विभोर गाने लगा गाना, विधुर झिल्ली ने नया छेड़ा तराना, निर्झरों की केलि का भी क्या ठि
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