माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँ। मेरे तो ब्रत यहै निरंतर, और न रुचि उपजाऊँ ॥ खेलन ऑंगन आउ लाडिले, नेकहु दरसन पाऊँ। 'कुंभनदास हिलग के कारन, लालचि मन ललचाऊँ ॥