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महात्मा जी के प्रति / सुमित्रानंदन पंत

निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!-- जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,-- गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय, अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल! मानव आत्मा के प्रतीक! आदर्शों से तुम ऊपर, निज उद्देश्यों से महान, निज यश से विशद, चिरंतन; सिद्ध नहीं, तुम लोक सिद्धि के साधक बने महत्तर, विजित आज तुम नर वरेण्य, गणजन विजयी साधारण! युग युग की संस्कृतियों का चुन तुमने सार सनातन नव संस्कृति का शिलान्यास करना चाहा भव शुभकर, साम्राज्यों ने ठुकरा दिया युगों का वैभव पाहन-- पदाघात से मोह मुक्त हो गया आज जन अन्तर! दलित देश के दुर्दम नेता, हे ध्रुव, धीर, धुरंधर, आत्म शक्ति से दिया जाति शव को तुमने जीवन बल; विश्व सभ्यता का होना था नखशिख नव रूपांतर, राम राज्य का स्वप्न तुम्हारा हुआ न यों ही निष्फल! विकसित व्यक्तिवाद के मूल्यों का विनाश था निश्चय, वृद्ध विश्व सामंत काल का था केवल जड़ खँडहर! हे भारत के हृदय! तुम्हारे साथ आज नि:संशय चूर्ण हो गया विगत सांस्कृतिक हृदय जगत का जर्जर
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