
मधुर ! बादल, और बादल, और बादल आ रहे हैं
और संदेशा तुम्हारा बह उठा है, ला रहे हैं।।
गरज में पुस्र्षार्थ उठता, बरस में कस्र्णा उतरती
उग उठी हरीतिमा क्षण-क्षण नया श्रृङ्गर करती
बूँद-बूँद मचल उठी हैं, कृषक-बाल लुभा रहे हैं।।
नेह! संदेशा तुम्हारा बह उठा है, ला रहे हैं।।
तड़ित की तह में समायी मूर्ति दृग झपका उठी है
तार-तार कि धार तेर
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