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मछुए का गीत - सुमित्रानंदन पंत

प्रेम की बंसी लगी न प्राण! तू इस जीवन के पट भीतर कौन छिपी मोहित निज छवि पर? चंचल री नव यौवन के पर, प्रखर प्रेम के बाण! प्रेम की बंसी लगी न प्राण! गेह लाड की लहरों का चल, तज फेनिल ममता का अंचल, अरी डूब उतरा मत प्रतिपल, वृथा रूप का मान! प्रेम की बंसी लगी न प्राण! आए नव घन विविध वेश धर, सुन री बहुमुख पावस के स्वर
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