हुआ चाहता एक तान में शेष, गान जग का मधुमय, दो अधरों का स्मित बनने को विश्व-रूप करता अनुनय; बन लघु जुही एक कोने में झरा चाहता नंदनवन, धरा एक रजकण में अपना भरा चाहती है यौवन; ‘स्वाति-बिंदु बन बरस पडूँ’--है निश्चय करता सिंधु गहन, बनकर लघु तारा प्रभात का ढला चाहता नील गगन; लघुता की महिमा पर विस्तृत विश्व वारता है जीवन, कवि का हृदय ढलकता है जब विदा-काल का आँसू बन।