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लब-ए-ख़िरद से यही बार बार निकलेगा - कालीदास गुप्ता रज़ा

लब-ए-ख़िरद से यही बार बार निकलेगा

निकालने ही से दिल का ग़ुबार निकलेगा

उगेंगे फूल ख़यालों के रेग-ज़ारों से

ख़िज़ाँ के घर से जुलूस-ए-बहार निकलेगा

कहीं फ़रेब खाना यही फ़िदा-ए-जाम

ब-वक़्त-ए-कार अजब होश्यार निकलेगा

चमन का हुस्न

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