कोजागर दीठियों की डोर-खिंचा (उगते से) इंदु का आकासदीप-दोल चढ़ा जा रहा । गोरोचनी जोन्ह पिघली-सी बालुका का तट, आह, चन्द्रकान्तमणि-सा पसीज-सा रहा । साथ हम नख से विलेखते अदेखते से मौन अलगाव के प्रथम का बढ़ा आ रहा । अरथ-उदास लोचनों में नदी का उजास टूटता, अकास में, कपास-मेघ जा रहा । नीर हटता-सा क्लिन्न तीर फटता-सा गिरा किन्तु मूढ़ हियरा, तुझे क्या हुआ जा रहा ।