कोई तुम जैसा था, ऐसा ही कोई चेहरा था याद आता है कि इक ख़्वाब कहीं देखा था । रात जब देर तलक चाँद नहीं निकला था मेरी ही तरह से ये साया मेरा तनहा था । जाने क्या सोच के तुमने मेरा दिल फेर दिया मेरे प्यारे, इसी मिट्टी में मेरा सोना था । वो भी कम बख़्त ज़माने की हवा ले के गई मेरी आँखों में मेरी मय का जो इक क़तरा था । तू न जागा, मगर ऐ दिल, तेरे दरवाज़े पर ऐसा लगता है कोई पिछले पहर आया था । तेरी दीवार का साया न खफ़ा हो मुझसे राह चलते यूँ ही कुछ देर को आ बैठा था । ऐ शबे-ग़म, मुझे ख़्वाबों में सही, दिखला दे मेरा सूरज तेरी वादी में कहीं डूबा था । इक मेरी आँख ही शबनम से सराबोर रही सुब‍‌ह को वर्ना हर इक फूल का मुँह सूखा था ।